कौड़ी शिल्प

लूप्त हो रही बस्तर की कौड़ी शिल्प कला........!

आज बस्तर की हस्तशिल्प कलाये दुनिया भर में प्रसिद्ध है। बस्तर की काष्ठकला , घड़वा कला या टेराकोटा से बनी वस्तुये देश विदेश के कई लोगों के घरों की शान बढ़ा रही है। हस्तशिल्प कला के अंतर्गत आज कौड़ी शिल्पकला लगभग विलूप्त सी हो गई है। 
चाहे बैगा के कपड़े हो, गौर माड़िया हार्न मुकूट हो या फिर चोली-घाघरा या छोटी टोकरी पर कौड़ी लगाकर उसे सजाने की एवं गूंथने यह परंपरागत कला को अब कोई पूछने वाला भी नही है। परिधान में चोली.घाघरा साड़ी आदि तथा टोकरी अथवा झोले में कौड़ियों को गूंथने की कला को कौड़ी शिल्प कहा जाता है।
कौड़ी शिल्प प्राचीन काल से बस्तर में प्रचलित रही है। जब बायसन हार्न माड़िया गौर के सींगों से बना मुकूट पहनता है तो उसके चेहरे के सामने सफेद कौड़ियों की लड़े लटकती दिखाई देती है। मेले जातरा में बैगा रंग बिरंगे परंपरागत कपड़े पहनकर देव आराधना करते है तो कपड़े पर गुंथी हुई कौड़ियों की सफेदी किसी का भी ध्यान आकर्षित कर लेती है। 
कौड़ियों से सजी हुई छोटी टोकनी या झोला हर कोई उपयोग करना चाहता है। बाजारों में जब कौड़ी शिल्प युक्त परिधान या चीजें बिकने के लिये आती है तो उसका मूल्य भी कौड़ियों के दाम ही मिलता है जिसके कारण कौड़ी शिल्पकार अब ये परंपरागत कौड़ी शिल्प को छोड़ने लगे है जिससे अब कौड़ी शिल्प की एक लूप्त हस्तशिल्पकला में शामिल हो चुकी है। 

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