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कुसूम की उपेक्षा

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कुसूम की उपेक्षा.....! शीर्षक देखकर किसी कुसूम नाम की युवती की पोस्ट ना समझिये, मैं बात कर रहा हूं कुसूम फल की। जिसे आप में अधिकांश लोगो ने खाया होगा। बस्तर में मौसमी फलों की बंपर पैदावार होती है। आदिवासी जंगलों से इन फलों को लाकर बेचते है जिससे उन्हे अच्छी खासी आय हो जाती है। कुछ फल ऐसे है जिनकी उत्पादकता बहुत है परन्तु खपत शून्य है। वैसा ही एक फल है कुसूम।  कुसुम गोल गोल हरा सा बेर के आकार का फल होता है। उपर हरा आवरण होता है अंदर बीज के उपर नारंगी रंग खटटी मीठी गुदे की परत चढ़ी होती है जिसे खाया जाता है। बाजार में इस फल की बहुत ही कम डिमांड है जिसके कारण ये पेड़ो पर सड़ जाते है। इस फल से विटामिन सी की प्राप्ति होता है। इसका स्वाद खटटा मीठा होता है। मीठे कुसुम फल ज्यादा अच्छे लगते है। मेरी ढाई साल की बेटी ने कल पहली बार छिंद का फल खाया है जल्द ही कुसूम फल का भी स्वाद चखाना है।  आप ने कुसूम फल खाया है कि नहीं ? किस नाम से जानते है आप? फोटो नेट से लिया गया है जिस किसी सज्जन ने यह फोटो लिया उसके लिये धन्यवाद। 

गोबर बोहारनी

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बस्तर  का गोबर बोहारनी तिहार.......! बस्तर में धान बोनी की शुरूवात के साथ गांवों में माटी तिहार बीज पंडुम और गोबर बोहरानी उत्सव प्रारंभ हो गया है। इसके चलते वनांचल में ग्रामीणों ने खेतों की पहली जुताई कर तीन दिनों तक उत्सव मनाया. सबसे पहले यहां के किसानों ने बोनी के उद्देश्य से अपने खेतों की पहली जुताई की। साजा पेड़ के नीचे जमीन में कीचड़ कर तथा धान के बीज मिला कर धरती में बीज गर्भाधान की परंपरा पूरी की। इसके बाद गांव के सभी देवी देवताओं की आराधना की गई उसके बाद दर्जनों ग्रामी ण पारद करने जंगल गए। महिलाओं ने इनके पीठ में गोबर से अपनी हथेली का निशान बनाया । इधर जो लोग पारद में नहीं गए उनके ऊपर गोबर फेंक कर परंपरानुसार गालियां दीं गईं। इधर जंगल से मार कर लाए गए जंगली चूहों पकाकर सामूहिक भोज किया गया। सैकड़ों किसान धान बीज लेकर देवगु़ड़ी पहुंचे । यहां ग्रामीणों द्वारा लाए गए बीज का कुछ हिस्सा भूमि में अर्पण करने के बाद शेष बीज ग्राम पुजारी ने लौटा दिया जिसे किसान अपने खेतों में छिड़क आए। वहीं बैलों को खेतों में चलाकर गो़ड़ खुंदनी रस्म पूरी की गई। इस संबंध में किसानों का मानना है कि जब ...

वामन विष्णु

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वामन विष्णु बौने विष्णु....! बस्तर में एक गाँव में मुझे भगवान विष्णु के बौने स्वरूप अर्थात वामन विष्णु की यह प्रतिमा देखने को मिली है। वामन अवतार का नाम सुनते ही यह कथा याद आ जाती है कि भगवान विष्णु ने वामन रूप धर कर राजा बलि से तीन पग जमीन मांगी थी। वामन अवतार के नाम सुनते ही मन मस्तिष्क में छाता और कंमडल लिये हुये भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा वाली छवि घुमने लगती है।  लेकिन यह प्रतिमा उस छवि से काफी भिन्न है। ओम सोनी दंतेवाड़ा कहते है कि देखने में तो विष्णु की यह आम प्रतिमाओं जैसे ही है, परन्तु गौर से देखने पर इस प्रतिमा में भगवान विष्णु को बौने के स्वरूप में प्रदर्शित किया गया है। यह प्रतिमा बीच से खंडित हो चुकी है। इसमें भी विष्णु की अन्य प्रतिमाओं की तरह ही आयुधों का अंकन है। चतुर्भुजी विष्णु के हाथों में क्रमशः शंख , चक्र , गदा का अंकन हैं , प्रतिमा का एक हाथ खण्डित है। सिर पर किरीटमुकुट , कानो में कुण्डल, गले में हार वन माला, कमर में मेखला एवं पैरों में  का अंकन है। साथ में वाहन गरूड़ भी बैठे हुये है। यह इस प्रकार की बौने स्वरूप में भगवान विष्णु की यह प्रतिमा बेहद ही ...

सूता

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पुरानी पीढ़ी का पुराना गहना - सूता....! चलो आज हम बात करते है गहनों की। गहने पहनना किसे अच्छा नहीं लगता। नर हो या नारी सभी गहने पहनना पसंद करते है। मनुष्य प्राचीन काल से आभूषण पहनने का शौकिन रहा है। अपने शरीर के हर अंगो को आभूषणों से अलंकृत करता आया है। गहने पहनने के मामले में पुरूषों की अपेक्षा महिलायें अधिक भाग्यशाली एवं आगे है। आभूषण महिलाओं के श्रृंगार है। नारी के सोलह श्रृंगार आभूषणों के बगैर पुरे नहीं होते है। शरीर के प्रत्येक अंग के लिये अलग अलग गहने होते है। सोने, चांदी, तांबे , पीतल एवं रत्न हीरे मोती जड़ित आभूषणों की लंबी श्रृंखला है जो कि सर्वप्रिय है। वैसे गले में हार, कंठाहर , मोतीहार, सिक्को की माला जैसे कई गहने पहने जाते है और प्राचीन प्रतिमाओं में भी गहनों का अंकन दिखाई देता है। गले में वैसे सोने के हार ही ज्यादा पहने जाते है परन्तु गले के कुछ गहने चांदी के ही अच्छे लगते है जैसे सूता। आज हम बात करते है गले का आभूषण सूता की।  बस्तर अंचल और छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अधिकांशत पुरानी पीढ़ी की महिलाओं के गले में सूता पहना हुआ दिखाई पड़ता है। बस्तर अंचल में सूता बहुत पहले से प्रचल...

सुकमा के जमींदार

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सुकमा के जमींदार - रामराज और रंगाराज आज हम बात करते है सुकमा की। सुकमा 2012 में दंतेवाड़ा से अलग होकर नया जिला बना है। सुकमा का नाम लगभग आप सभी ने माओवादी घटनाओं के कारण ही सुना होगा। सुकमा का अपना अलग इतिहास रहा है। सुकमा रियासत कालीन बस्तर में एक बड़ी जमींदारी रही है। चक्रकोट (प्राचीन बस्तर) में सन 1324 में अन्नमदेव ने अंतिम नाग शासक राजा हरिशचंद्र देव पर विजय पाकर बस्तर में चालुक्य वंश की नींव रखी। सुकमा राजपरिवार की अन्नमदेव से पूर्व यहां आने के कुछ सुत्र मिलते है।  सुकमा राजपरिवार ने अन्नमदेव की अधीनता स्वीकार कर बस्तर राज परिवार से अपने वैवाहिक संबंध स्थापित किये। सुकमा राजपरिवार की कुल 09 राजकुमारियां बस्तर राज परिवार को ब्याही गई ऐसी जानकारी बस्तर इतिहास में मिलती है। रियासत काल में सुकमा को जमींदारी बना दी गई। सुकमा राजपरिवार से जुड़ी एक बेहद रोचक मिलती है वो यहां के जमींदारों के नामों के क्रमिकता। भारत की आजादी तक सुकमा के लगभग 11 पीढ़ियों में जमींदारों के नाम रामराज और रंगाराज मिलते है। यदि पिता का नाम रामराज तो बेटा रंगाराज कहलाता।  इस संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी बस्त...

छिन्द में छुपा है बस्तर

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छिन्द में छुपा है बस्तर.....! बस्तर में लगभग सब जगह छिन्द के पेड़ आपको दिखाई देंगे। यह खजुर की पेड की ही एक उप प्रजाति है। किन्तु खजुर से अलग है। यह पेड़ पांच फीट से चालीस फीट तक का ऊँचा होता है। अप्रेल के अंत में इन पेडो पर गुच्छो में फल लगने लग जाते है। बस्तर में इस फल को छिन्दपाक कहा जाता है। अभी पुरे बस्तर के छिन्द पेडो में हरे हरे छोटे छोटे छिन्दपाक लगे हुए है। ये फल मई माह के अंत तक पक जायेंगे। फल लगने से लेकर पकने तक ये फल तीन बार अपना रंग बदलते है, शुरूआत में हरा , मध्य में स्वर्ण की तरह पीला , और पकने पर भूरे कथ्थई रंग के हो जाते है। अभी कहीं कहीं छिन्द के फल पीले हो चुके है , जब सूर्य की रोशनी इन पीले छिन्द के गुच्छो पर पड़ती है तब ये फल सोने से बने फल जैसे लगते है। कहीं कहीं छिन्द पाक पक कर बाजारो में आ चुके है.। यह मीठा एवं खजुर की तरह होता है पर खजुर से भिन्न होता है। खजुर का आकार बड़ा होता है इसका आकार छोटा होता है। सुखने पर इसका खारक नहीं बनता है। छिन्द पाक को खाने से पानी प्यास बहुत लगती है। इसे सुखा कर भी रखा जाता है ताकि वर्ष भर खाया जा सके। छिन्द के पेडो से फल के अतिरिक्...

खपरा

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खपरा कहते है इसे ......! दोस्तो यह खपरा है , यह कच्चे घर की छत है. इसे कवेलू भी कहते है. बस्तर मे आदिवासी खुद ही खपरा बनाते है और घरो की छत मे उपयोग करते है. खपरा बनाने के लिये लकड़ी के सांचे होते है, उन सांचो मे अच्छी तरह की चिकनी मिट्टी को खपरा का आकार देकर सुखा दिया जाता है। फिर उन कच्चे खपरो को आग मे पकाया जाता है। फिर तैयार खपरो को छत मे लगाया जाता है।  खपरो की छत वाले घर बेहद ठंडे एवँ गर्मी के लिये अनुकुल होते है. अब तो खपरे वाले घर भी टिन य़ा कांक्रीट की पक्के छत वाले घरो मे तब्दील होते जा रहे हो. बस्तर मे गांवो मे अधिकांशत घर टिन की छत वालो मे परिवर्तित होते जा रहे है. जब खपरे वाली छत ही नही होगी तो खपरे कौन बनायेगा ?