Posts

करील बास्ता

Image
प्रतिबंधित करील .....! बांस से रोजमर्रा की उपयोगी वस्तुयें तो बनती ही है, बस्तर में बांस की सब्जी भी खाई जाती है। बांस की नयी कोपलों को बडे चाव से सब्जी बनाकर खाया जाता है। इन कोपलों को बास्ता या करील कहा जाता है। जून से अगस्त तक बांस के झुरमुटो में नयी कोपलों (बास्ता) को निकाला जाता है। जिसे बाजार में बेचा जाता है। बास्ता में सायनोजेनिक ग्लुकोसाईठ, टैक्सीफाईलीन एवं बेंजोईक अम्ल पाया जाता है। जो स्वास्थ्य के लिये काफी फायदेमंद माना जाता है। यह कफ निःसारक, उत्तेजक, तृषाशामक होता है। कृमिनाशक एवं ऐंटी रेबीज होने के कारण ग्रामीण इसका उपयोग खाने में करते है। बास्ता का उपयोग अचार बनाने के लिये भी किया जाता है। औषधियों गुणों के कारण बडे पैमाने में इसकी तस्करी होती है। बास्ता को तोडकर बाजार में बेचना एवं इसकी तस्करी करना प्रतिबंधित है। फिर भी ग्रामीण चोरी छिपे इसे बाजार में बेचने लाते है। वन विभाग हर साल सैकड़ो टन बास्ता की जब्ती करता है। बांस की नयी कोपले जंगलो से तोड़ ली जाती है जिसके कारण बांस के वनों का रकबा निरंतर कम होता जा रहा है यह एक चिंता का विषय है। आप में से बहुत से लोगों ने इसकी सब...

बुलाक नथ

Image
चेहरे की नूर - बुलाक ........! नथ सिर्फ नाक की ही नहीं वरन पुरे चेहरे की नूर होती है। महिलाओ में 16 श्रृंगार का विशेष महत्व है। इन 16 श्रृंगारों में नाक में नथ पहनना एक प्रमुख श्रृंगार है। महिलाओं की नथ सामाजिक हैसियत की प्रतीक मानी जाती है। विभिन्न समाजो में महिलायें अलग अलग प्रकार की नथ पहनती है। बस्तर में आदिवासी महिलायें शंकुआकार की मोसोकुटा और गोल जालीदार नथ ही पहनती है। इसमें से मोसोकुटा अब चलन से बाहर होती जा रही है। मध्य बस्तर में विशेषतः भतरा जनजाति की महिलायें मो सोकुटा नथ के साथ साथ एक विशेष तरह की बुलाक नथ भी पहनती है। नाक के दोनो नथुनों की बीच में से छेदकर बुलाक नथ पहनी जाती है। नाक के दोनो तरफ मोसोकुटा और बीच में बुलाक नथ पहनी आदिवासी महिलाये मध्य बस्तर में ही आपको देखने को मिलेगी। ये तीनों नथ किसी भी आदिवासी महिला के सौंदर्य को तीन गुना कर देती है। बुलाक नथ का चलन अब सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रो में ही है। सामान्यतः बुलाक नथ सोने से बनी साधारण गोलाकार नथ ही होती है। बुलाक नथ में कोहिनूर हीरे की तरह चमकते हुये नग हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचते है। इटली के विली सैनसन एक पेशेवर ...

जीर्णोद्धार

Image
मंदिर का जीर्णोद्धार......! दंतेवाड़ा में शंखिनी डंकिनी के संगम पर स्थापित मां दंतेश्वरी का मंदिर सदियों पुराना है। इस मंदिर का वर्तमान स्वरूप पूर्व के कई जीर्णोद्धारों का परिणाम है। आज से 10-15 साल पहले का मंदिर परिसर और वर्तमान में मंदिर परिसर में काफी अंतर है जिसे आप सभी ने देखा है। लेकिन आजादी से पहले इस मंदिर का जीर्णोद्धार कब हुआ था इसकी जानकारी बहुत ही कम लोगो है। माता भुवनेश्वरी देवी मंदिर के बाहर एवं अंदर लगे हुये शिलालेख इस मंदिर के जीर्णोद्धार के मूक गवाह है। आप  में से कुछ लोगो का ध्यान इन शिलालेखों पर गया होगा। मंदिर के बाहर दरवाजे का पास के शिलालेख की भाषा अंग्रेजी है वहीं मंदिर के अंदर वाला शिलालेख हिन्दी में लिखा गया है। इस शिलालेख में लिखित लेख के अनुसार इस मंदिर का पुर्ननिर्माण 1932-33 के दरम्यान किया गया था ,उस समय बस्तर की शासिका महारानी प्रफुल्लकुमारी थी, उनके पति श्री प्रफुल्लचंद्र भंजदेव का नाम सहयोगी के रूप में अंकित है। डी0आर0 रतनम आई0सी0एस0 थे जो कि बस्तर के एडमिनिस्ट्रेटर के पद पर थे, वहीं मुंशी उमाशंकर एस0डी0ओ0 के पद पर थे। ज्ञात हो कि महारानी प्रफुल्लकुम...

मृतक स्मारक

Image
चित्र बहुत कुछ कहते हैं.......! बस्तर के जनजातीय समाजो मे मृत्यु के बाद स्मारक स्थापित करने की परंपरा आदि काल से चली आ रही है. मृतक स्मारको के बहुत से प्रकार यहाँ प्रचलित है. आज कल पत्थर की पतली शिलाओ का उपयोग मृतक स्तम्भ बनाने के लिये किया जा रहा है. मृतक को दफ़नाने के बाद उसकी समाधि पर इन शिलाओ को स्मारक के रूप मे लगाया जाता है. इन शिलाओ पर मृतक की स्मृतियाँ, रोजमर्रा की चीजे, पशु पक्षी, पुरानी बाते, कल्पना से भी परे जीव जन्तु आदि के रंगीन चित्र उकेरे जाते है. ये चित्र ह जारो साल पुराने शैलचित्रो के समान ही है.जिसे आदिवासियो ने आज भी सहेज रखा है. पीढ़ी दर पीढ़ी ये चित्र हस्तांतरण होते रहते है. बाप दादाओ से सुने हुए किस्से भी इन चित्रो मे दिखायी देते है. ये चित्र प्राचीन शैल चित्रकला के जीवन्त उदाहरण है. चित्रो से भरे ये मृतक स्मारक मृतक की जीवनी के साथ साथ कुछ पुराने किस्सो को भी दर्शाते हैं. उदाहरण के लिये इस स्मारक के चित्रो की नीचे वाली पंक्ति मे काले टोप एवं लाल वर्दी पहने, बन्दुक धारी अंग्रेज सैनिकों को दिखाया है, उसमे से कुछ को तीर भी लगा है, यह चित्र बतलाता है कि आजादी से पहले ...

रानी कीड़ा

Image
राजा और रानी ......! मानसूनी की पहली फुहारे जब धरती पर पड़ती है तो इंसानों के साथ साथ कीट पंतगे भी बेहद खुशी से झुम उठते है। हर जगह नये नये कीड़े मकोड़े दिखाई पड़ते है। अक्सर पहली बरसात के बाद से खेतों एवं रेतीली जमीन पर लाल रंग के छोटे छोटे कीड़े घुमते हुये नजर आते है। लाल रंग की मलमल ओढ़े ये कीड़े बहुत ही सुंदर लगते है। यहां बस्तर में इन्हे रानी कीड़ा कहते है। रानी कीड़ा मतलब ही किसी रानी की तरह बेहद ही सुंदर। यह कीड़ा रेड वेल्वेट माईट है। इसके पीठ की त्वचा बिल्कुल मलमल की तरह मुलायम होती है। बच्चे तो इन कीड़ो से बड़ा प्रेम करते है। जब भी ये दिखते है बच्चे इन्हे तुरंत उठा लेते है। हथेली में लेते ही ये अपने सभी पैरों को सिकोड़कर निष्क्रिय हो जाते है। जमीन पर छोड़ते ही भाग जाते है। आप में से प्रायः सभी ने इन रानी कीड़ो को देखा होगा। मैं इसे कई सालों से देख रहा हूं। दो दिन पहले मैने राजा और रानी दोनो को खेत की मेड़ पर घुमते हुये देखा तब मैंने राजा और रानी दोनो को अपने हथेली पर ले लिया, रानी तो मुझसे नाराज हो गई, बिल्कुल कैकेयी की तरह कोप भवन में चली गई थी। राजा साहब बहुत ही मचलने लग गये थे, तुफान मचा द...

चंदन जात्रा

Image
चंदन जात्रा से गोंचा पर्व का आगाज......! ओडिसा की तरह बस्तर में भी भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा बड़े धुमधान से मनायी जाती है। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से पूर्व जितने भी अनुष्ठान होते है सभी अनुष्ठान श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक संपन्न किये जाते है। बस्तर में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा गोंचा पर्व के नाम से विख्यात है। बस्तर में गोंचा महापर्व का शुभारंभ चंदन जात्रा अनुष्ठान से होता है। इस अनुष्ठान में भगवान शालिग्राम की पूजा की जाती है। इंद्रावती के पवित्र जल से भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा एवं बलभद्र की प्रतिमाओं को स्नान कराया जाता है। भगवान के विग्रहों को चंदन का लेप लगाया गया है। जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा एवं बलभद्र की विग्रहों को स्थापित किया जाता है। इसके बाद भगवान जगन्नाथ का अनसर काल प्रारंभ हो जाता है। यह अवधि कुल 15 दिन की होती है। इस पंद्रह दिवस में भगवान के दर्शन वर्जित रहता है। ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा के चंदन जात्रा एवं देवस्नान के बाद भगवान बीमार हो जाते है। 13 जुलाई के दिन भगवान जगन्नाथ को काढा पिलाया जाता है। उस दिन नेत्रोत्सव में भगवान दर्शन देते हैं. देवस्नान एवं चंदनजा...

खिलौने मिट्टी वाले

Image
खिलौने मिट्टी वाले...! मुझे अच्छी तरह से याद है कि बचपन में हम भी मिट्टी के खिलौने बनाते थे. मिट्टी के गणेश बनाना हमे खुब भाता था. फ़िर गजानन महाराज को छोटे से पोखर मे विसर्जित कर देते थे. हाथी  🐘  बनाकर उसे खूब सजाया है. कटोरी दिये तो बहुत बना बना कर तोड़े है. सच मे , वे दिन बहुत ही अच्छे दिन थे. बस्तरिया बच्चे के द्वारा ली गयी इन तस्वीरो ने मुझे मेरा बचपन याद दिला दिया. इन बच्चो ने बड़े ही सुन्दर खिलौने बनाये है. बैलो पर नागर फ़ान्दे हुए किसान, यह दृश्य, सदियों से आज तक यथावत  है, दूसरा खिलौना ट्रैक्टर का है जो आज उसका विकल्प बन गया है. खेल खेल में इन बच्चो ने बता दिया कि जो चीज सदियों से नहीं बदली, वो अब बदल रही है, बदलाव जरुरी भी है. आप ने बचपन मे मिट्टी के खिलौने बनाये है कि नहीं, बनाये है तो कौन से? अपना अनुभव जरुर शेयर करे. फोटो - बस्तरिया बच्चे!....... ओम!